शिक्षा

किसी भी प्रकार के विकास एवं उन्नति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के अभाव में कुछ भी अर्थपूर्ण हांसिल नहीं किया जा सकता। यह लोगों के जीवन स्तर में सुधार तथा उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु क्षमताओं का निर्माण कर तथा बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साक्षरता के स्तर में वृद्धि से उच्च उत्पादकता बढ़ती है तथा अवसरों के सृजन से स्वास्थ्य में सुधार, सामाजिक विकास और उचित निष्पपक्षता को प्रोत्साहन मिलता है। यह लोगों को अपने बलबूते पर किसी भी निर्णय लेने तथा विचार करने हेतु सामर्थ्य‍ प्रदान करता है। साक्षरता स्तर में वृद्धि तथा कुशल कार्यबल का विकास, मध्य प्रदेश को जीवन की गुणवत्ता में सुधार हेतु सहायता कर रहा है। आज के बदलते युग में उच्च शिक्षित एवं कुशल पेशेवरों की आवश्यकता निरंतर बढ़ रही है। राज्य के लिए यह अत्यावश्यक है कि वह सभी स्तर के लोगों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। साथ ही यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सभी अपनी बुनियादी शिक्षा गुणवत्ता के साथ पूर्ण करे और सभी के लिए उच्च शिक्षा एवं उन्नत कौशल प्राप्त करने के अवसर यहां उपलब्ध हो। शिक्षा के क्षेत्र में मध्य्प्रदेश ने बहुत अधिक उन्नति की है। साक्षरता दर वर्ष 2001 में 64.11 प्रतिशत थी, (संपूर्ण भारत - 65 प्रतिशत) जो वर्ष 2011 में बढ़कर 70.63 प्रतिशत (संपूर्ण भारत में 74.04 प्रतिशत) हुई। 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के दाखिलों का लक्ष्य लगभग पूरा कर लिया गया है। वर्ष 2011 में, प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए सकल दाखिला अनुपात 98.88 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक सस्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए सकल दाखिला अनुपात 99.27 प्रतिशत रहा है। ड्रॉपआउट रेट में भी कमी आयी है और अब यह प्राथमिक स्तर पर 8.2 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 7.4 प्रतिशत हो गई है। मध्य प्रदेश में महिला साक्षरता में सुधार लाने हेतु अधिक जोर दिया जा रहा है। राज्य का लक्ष्य न केवल साक्षर राज्य के रूप में बल्कि स्कू्ली समाज से परे शिक्षा के प्रति जागरूक समाज के रूप में शिक्षित राज्य होना है। इसलिए मध्यप्रदेश शासन सभी को उचित गुणवत्ता तथा प्रासंगिक शिक्षा के अवसर प्रदान करने और साथ ही रोजगारोन्मुखी तथा कौशल विकास के पाठ्यक्रम (कोर्स) पर अधिकतम बल दे रही है।

इस क्षेत्र में, शासन भी निजी उद्यमियों को राज्य में रखने हेतु उत्सुक है, जो कि इन उद्देश्यों को वास्तविकता में लाने हेतु सहयोग प्रदान कर सकते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 6 से 14 वर्ष के बीच के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को प्रमाणित करने हेतु 1 अप्रैल, 2010 को प्रभाव में लाया गया। इस अधिनियम के द्वारा शासन तथा स्थानीय अधिकारियों पर निर्धारित मापदण्ड और नियम के अनुसार विद्यालय, शिक्षक तथा अन्य सुविधायें उपलब्ध कराने हेतु दायित्व सौंपा गया। समाज या राज्य अपना अधिकतम विकास करने में तभी सक्षम होगा, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता में वृद्धि कर पाएगा। अपनी इस क्षमता को हांसिल करने के लिए व्यक्ति को शिक्षित होना होगा। ‘'बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009'' के द्वारा राज्य शासन और स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करने हेतु आदेश दिया गया है कि 6-14 वर्ष के आयु का प्रत्येक बच्चा कम से कम प्राथमिक शिक्षा पूरी करे।

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